चंद्रशेखर आजाद पर कविता

चंद्रशेखर आजाद पर कविता – Poem on Chandrashekhar Azad in Hindi – Short Poetry & Kavita

Posted by

भारत के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में से एक सेनानी पण्डित चन्द्रशेखर ‘आजाद’ जिनका जन्म २३ जुलाई १९०६ में भाबरा गाँव में हुआ था आज़ाद जी को भारत देश को आज़ादी दिलाने की चाह थी | एक गोलीबारी में आज़ाद जी की मृत्यु २७ फ़रवरी १९३१ को हो गयी थी इन्ही के नेतृत्व में भगत सिंह जी ने दिल्ली की असेम्बली में बम फोड़ने का प्रयास को सफलतापूर्वक पूरा किया था | इसीलिए हम आपको चंद्रशेखर आज़ाद जी के ऊपर लिखी गयी कुछ बेहतरीन कविताओं के बारे में बताते है जो की आपके लिए काफी महत्वपूर्ण है |

चन्द्रशेखर आजाद पर हिन्दी कविता

अगर आप स्वतंत्रता सेनानियों पर कविताएं, चन्द्रशेखर आजाद की जीवनी, चन्द्रशेखर आजाद के नारे, स्वतंत्रता पर कविताएं, चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय हिंदी में, चंद्रशेखर आजाद की मौत, चंद्रशेखर आजाद इमेज, चन्द्रशेखर आजाद फोटो, chandra shekhar azad dialogue in hindi, chandra shekhar azad shayari, poem on chandrashekhar azad in english के बारे में जानकारी के लिए आप यहाँ से जान सकते है :

चन्द्रशेखर नाम, सूरज का प्रखर उत्ताप हूँ मैं,
फूटते ज्वाला-मुखी-सा, क्रांति का उद्घोष हूँ मैं।
कोश जख्मों का, लगे इतिहास के जो वक्ष पर है,
चीखते प्रतिरोध का जलता हुआ आक्रोश हूँ मैं।
विवश अधरों पर सुलगता गीत हूँ विद्रोह का मैं,
नाश के मन पर नशे जैसा चढ़ा उन्माद हूँ मैं।
मैं गुलामी का कफ़न, उजला सपन स्वाधीनता का,
नाम से आजाद, हर संकल्प से फौलाद हूँ मैं।
आँसुओं को, तेज मैं तेजाब का देने चला हूँ,
जो रही कल तक पराजय, आज उस पर जीत हूँ मैं।
मैं प्रभंजन हूँ, घुटन के बादलों को चीर देने,
बिजलियों की धड़कनों का कड़कता संगीत हूँ मैं।
सिसकियों पर, अब किसी अन्याय को पलने न दूँगा,
जुल्म के सिक्के किसी के, मैं यहाँ चलने न दूँगा।
खून के दीपक जलाकर अब दिवाली ही मनेगी,
इस धरा पर, अब दिलों की होलियाँ जलने न दूँगा।

Chandrashekhar Azad Par Kavita

राज सत्ता में हुए मदहोश दीवानो! लुटेरों,
मैं तुम्हारे जुल्म के आघात को ललकारता हूँ।
मैं तुम्हारे दंभ को-पाखंड को, देता चुनौती,
मैं तुम्हारी जात को-औकात को ललकारता हूँ।
मैं जमाने को जगाने, आज यह आवाज देता
इन्कलाबी आग में, अन्याय की होली जलाओ।
तुम नहीं कातर स्वरों में न्याय की अब भीख माँगो,
गर्जना के घोष में विद्रोह के अब गीत गाओ।
आग भूखे पेट की, अधिकार देती है सभी को,
चूसते जो खून, उनकी बोटियाँ हम नोच खाएँ।
जिन भुजाओं में कसक-कुछ कर दिखानेकी ठसक है,
वे न भूखे पेट, दिल की आग ही अपनी दिखाएँ।
और मरना ही हमें जब, तड़प कर घुटकर मरें क्यों
छातियों में गोलियाँ खाकर शहादत से मरें हम।
मेमनों की भाँति मिमिया कर नहीं गर्दन कटाएँ,
स्वाभिमानी शीष ऊँचा रख, बगावत से मरें हम।
इसलिए, मैं देश के हर आदमी से कह रहा हूँ,
आदमीयता का तकाजा है वतन के हों सिपाही।
हड्डियों में शक्ति वह पैदा करें, तलवार मुरझे,
तोप का मुँह बंद कर, हम जुल्म पर ढाएँ तबाही।
कलम के जादूगरों से कह रही युग-चेतना यह,
लेखनी की धार से, अंधेर का वे वक्ष फाड़ें।
रक्त, मज्जा, हड्डियों के मूल्य पर जो बन रहा हो,
तोड़ दें उसके कंगूरे, उस महल को वे उजाड़ें।
बिक गई यदि कलम, तो फिर देश कैसे बच सकेगा,
सर कलम हो, कालम का सर शर्म से झुकने व पाए।
चल रही तलवार या बन्दूक हो जब देश के हित,
यह चले-चलती रहे, क्षण भर कलम स्र्कने न पाए।
यह कलम ऐसे चले, श्रम-साधना की ज्यों कुदाली,
वर्ग-भेदों की शिलाएँ तोड़ चकनाचूर कर दे।
यह चले ऐसे कि चलते खेत में हल जिस तरह हैं,
उर्वरा अपनी धरा की, मोतियों से माँग भर दे।
यह चले ऐसे कि उजड़े देश का सौभाग्य लिख दे,
यह चले ऐसे कि पतझड़ में बहारें मुस्कराएँ।
यह चले ऐसे कि फसलें झूम कर गाएँ बघावे,
यह चले तो गर्व से खलिहान अपने सर उठाएँ।
यह कलम ऐसे चले, ज्यों पुण्य की है बेल चलती,
यह कलम बन कर कटारी पाप के फाड़े कलेजे।
यह कलम ऐसे चले, चलते प्रगति के पाँव जैसे,
यह कलम चल कर हमारे देश का गौरव सहेजे।
सृष्टि नवयुग की करें हम, पुण्य-पावन इस धरा पर,
हाथ श्रम के, आज नूतन सर्जना करके दिखाएँ।
हो कला की साधना का श्रेय जन-कल्याणकारी,
हम सिपाही देश के दुर्भाग्य को जड़ से मिटाएँ।

Short Poetry & Kavita

Chandra Shekhar Azad Poem by Hariom Pawar

अगर आप किसी भी कक्षा जैसे Class 1, Class 2, Class 3, Class 4, Class 5, Class 6, Class 7, Class 8, Class 9, Class 10, Class 11, Class 12 के लिए अन्य भाषाओ जैसे Hindi, Kannada, Malayalam, Marathi, Telugu, Urdu, Tamil, Gujarati, Punjabi, Nepali, English Language Font 120 Words, 140 Character के 3D HD Image, Wallpapers, Photos, Pictures, Pics Free Download के बारे में जानना चाहे तो यहाँ से जान सकते है :

चन्द्रशेखर आजाद नै अपणी जिन्दगी दा पै लादी रै॥
फिरंगी गेल्या लड़ी लड़ाई उनकी जमा भ्यां बुलादी रै॥
फिरंगी राज करैं देश पै घणा जुलम कमावैं थे
म्हारे देश का माल कच्चा अपणे देश ले ज्यावैं थे
पक्का माल बना कै उड़ै उल्टा इस देश मैं ल्यावैं थे
कच्चा सस्ता पक्का म्हंगा हमनै लूट लूट कै खावैं थे
भारत की फिरंगी लूट नै आजाद की नींद उड़ादी रै॥
किसानां पै फिरंगी नै बहोत घणे जुलम ढाये थे
खेती उजाड़ दई सूखे नै फेर बी लगान बढ़ाये थे
जो लगान ना दे पाये उनके घर कुड़क कराये थे
किसानी जमा मार दई नये नये कानून बनाये थे
क्रान्तिकारियां नै मिलकै नौजवान सभा बना दी रै॥
जात पात का जहर देश मैं इसका फायदा ठाया था
आपस मैं लोग लड़ाये राज्यां का साथ निभाया था
व्हाइट कालर आली शिक्षा मैकाले लेकै आया था
साइमन कमीशन गो बैक नारा चारों कान्हीं छाया था
म्हारी पुलिस फिरंगी नै म्हारी जनता पै चढ़ा दी रै॥
जलियां आला बाग कान्ड पापी डायर नै करवाया था
गोली चलवा मासूमां उपर आतंक खूब फैलाया था
मनमानी करी फिरंगी नै अपना राज जमाया था
जुल्म के खिलाफ आजाद नै अपना जीवन लाया था
रणबीर नै तहे दिल तै अपणी कलम चलादी रै॥

Chandrashekhar Azad Poems in Hindi

देकर जन्म धरती पर आपको शायद भगवान ने खुशी मनाई होगी
अमर हो गया वो गुरु भी जिसने आजादी की ज्योत आपके मन में जगाई होगी
इतिहास कुछ भी कहे लेकिन जानता है हर हिन्दुस्तानी बिना आजाद के आजादी हरगिज नहीं आई होगी
निर्भीक और निडरता से आपकी, अंग्रेजों की रूह भी थर्राई होगी
नाम हो जाएगा आपका इस युग में और बन जाओगे आजाद पुरुष युग-युग तक
ये बात शायद कई राजनीतिज्ञों को न पसंद आई होगी
जब फिर किसी ने मंथरा की भूमिका तो निभाई होगी
तब जाकर आपके विरुद्ध कोई एक ऐसी गंदी रणनीति बनाई होगी
तभी तो चन्द्रशेखर जैसे आजाद बलिदानी को आतंकी सुनने पर
दिल्ली को लज्जा तक नहीं आई होगी
नहीं जरूरत आपको किसी सम्मान की, न आवश्यकता है किसी पुरस्कार की
क्योंकि हर युवा के मन में आपकी छवि निश्चित ही समाई होगी
नमन करता हूं चरणों में आपके जन्मदिवस पर
होंगे जहां भी आप तो देखकर भारत की राजनीति, आपको भी हंसी तो आई होगी
आज फिर जरूरत है देश को आपकी आजाद, जानते हुए भी बलिदानी की कीमत भारत में
आपने फिर से आने की गुहार भगवान से लगाई होगी
और देखकर आपका देशप्रेम भगवान ने भी
किसी मां को अपनी कोख करने बलिदान देश के खातिर इतनी हिम्मत जुटाई होगी।

Poem on Chandrashekhar Azad in Hindi

Poetry on Chandrashekhar Azad

तुम आजाद थे, आजाद हो, आजाद रहोगे,
भारत की जवानियों के तुम खून में बहोगे।
मौत से आंखें मिलाकर वह बात करता था,
अंगदी व्यक्तित्व पर जमाना नाज करता था।
असहयोग आंदोलन का वो प्रणेता था,
भारत की स्वतंत्रता का वो चितेरा था।
बापू से था प्रभावित, पर रास्ता अलग था,
खौलता था खून अहिंसा से वो विलग था।
बचपन के पन्द्रह कोड़े, जो उसको पड़े थे,
आज उसके खून में वो शौर्य बन खड़े थे।
आजाद के तन पर कोड़े तड़ातड़ पड़ रहे थे,
‘जय भारती’ का उद्घोष चन्दशेखर कर रहे थे।
हर एक घाव कोड़े का देता मां भारती की दुहाई,
रक्तरंजित तन पर बलिदान की मेहंदी रचाई।
अहिंसा का पाठ उसको कभी न भाया,
खून के ही पथ पर उसने सुकून पाया।
उसकी शिराओं में दमकती थी जोशो जवानी,
युद्ध के भीषण कहर से लिखी थी उसने कहानी।
उसकी फितरत में नहीं थीं प्रार्थनाएं,
उसके शब्दकोशों में नहीं थीं याचनाएं।
नहीं मंजूर था उसको गिड़गिड़ाना,
और शत्रु के पैर के नीचे तड़फड़ाना।
मंत्र बलिदान का उसने चुना था,
गर्व से मस्तक उसका तना था।
क्रांति की ललकार को उसने आवाज दी थी,
स्वतंत्रता की आग को परवाज दी थी।
मां भारती की लाज का वो पहरेदार था,
भारत की स्वतंत्रता का वो पैरोकार था।
अल्फ्रेड पार्क में लगी थी आजाद की मीटिंग,
किसी मुखबिर ने कर दी देश से चीटिंग।
नॉट बाबर ने घेरा और पूछा कौन हो तुम,
गोली से दिया जवाब तुम्हारे बाप हैं हम।
सभी साथियों को भगाकर रह गया अकेला,
उस तरफ लगा था बंदूक लिए शत्रुओं का मेला।
सिर्फ एक गोली बची थी भाग किसने था मेटा,
आखिरी दम तक लड़ा वो मां भारती का था बेटा।
रखी कनपटी पर पिस्तौल और दाग दी गोली,
मां भारती के लाल ने खेल ली खुद खून की होली।
तुम आजाद थे, आजाद हो, आजाद रहोगे,
भारत की जवानियों के तुम खून में बहोगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *