झांसी की रानी पोएम

झांसी की रानी कविता – झांसी की रानी पोएम – Jhansi ki Rani Poem in Hindi by Subhadra Kumari Chauhan

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रानी लक्ष्मीबाई जिन्हे झांसी की रानी के नाम से जाना जाता है वह झांसी की एक रानी थी जो की एक वीर थी जिनकी एक कविता झाँसी वाली रानी थी जो की बहुत प्रसिद्द है | उनका जन्म 19 नवम्बर 1828 में वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुई तथा उनकी मृत्यु 18 जून 1858 ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुई थी वह एक बहुत बड़ी स्वतंत्रता संग्रामी थी जिसके लिए हम आपको झाँसी की रानी के ऊपर कुछ बेहतरीन कविताये बताते है जो की आपके लिए काफी महत्वपूर्ण है जिन्हे आप यहाँ से पढ़ सकते है |

झांसी की रानी पोएम बय सुभद्रा कुमारी चौहान – झांसी की रानी कविता का सारांश

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

झांसी की रानी कविता

झांसी की रानी की कविता

तुम भूल गए शायद मुझको, मैं झाँसी वाली रानी हूँ
जो नपुंसकों पर भारी थी, मैं वो मर्दानी हूँ
लुटती अस्मत, लगती कीमत… ये नारी की कैसी किस्मत ?
आजाद देश के वीरों से कुछ प्रश्न पूछने आई हूँ…………
तब आजादी की बीज बनी, अब तुम्हें जगाने आई हूँ
आजाद देश में नारी गुलाम… ये किसने रीत चलाई है……………..
भारत की हर एक स्त्री को फिर “मनु” आज बना दो तुम
सभी स्त्रियों के स्वाभिमान को फिर से आज जगा दो तुम………………..
शस्त्र-शास्त्र से सुसज्जित कर दो, हर-एक घर-आँगन को
निडर और निर्भय कर दो, हर-एक वन-उपवन को
बच्चों के खेल-खिलौनों में शामिल कर दो… झाँसी की तलवार को
बच्चों के नस-नस में भर दो, निडरता और स्वाभिमान को
किताबों से बाहर निकालो मुझे और……….
लिखने दो शौर्य गाथाएँ अपने घर-आँगन में
ताकि तुम गर्व से कह सको कि मैं तेरी मनु / छबिली हूँ…………..
अब ढूँढो मुझको अपने घर-आंगन में, मैं लक्ष्मीबाई अलबेली हूँ.

झाँसी की रानी पर कविता

झांसी की रानी के अलावा उनके ऊपर कई और कविताये जैसे की रानी थी वह झांसी की jhansi rani kavita, झाँसी की रानी kavita इन हिंदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, का सार, का भावार्थ, in hindi summary pdf, झाँसी की रानी poem, mp3 download, class 6, translation in hindi, meaning, jhansi ki rani short poem in english, mp3, video, language के बारे में जानकारी यहां से जान सकते है :

रानी थी वह झांसी की,
पर भारत जननी कहलाई।
स्वातंत्र्य वीर आराध्य बनी,
वह भारत माता कहलाई॥
मन में अंकुर आजादी का,
शैशव से ही था जमा हुआ।
यौवन में वह प्रस्फुटित हुआ,
भारत भू पर वट वृक्ष बना॥
अंग्रेजों की उस हड़प नीति का,
बुझदिल उत्तर ना दे पाए।
तब राज महीषी ने डटकर,
उन लोगों के दिल दहलाए॥
वह दुर्गा बनकर कूद पड़ी,
झांसी का दुर्ग छावनी बना।
छक्के छूटे अंग्रेजों के,
जन जागृति का तब बिगुल बजा॥
संधि सहायक का बंधन,
राजाओं को था जकड़ गया।
नाचीज बने बैठे थे वे,
रानी को कुछ संबल न मिला॥
कमनीय युवा तब अश्व लिए,
कालपी भूमि पर कूद पड़ी।
रानी थी एक वे थे अनेक,
वह वीर प्रसू में समा गई॥
दुर्दिन बनकर आए थे वे,
भारत भू को वे कुचल गए।
तुमने हमको अवदान दिया,
वह सबक सीखकर चले गए॥
है हमें आज गरिमा गौरव,
तुम देशभक्ति में लीन हुई।
जो पंथ बनाया था तुमने,
हम उस पर ही आरूढ़ हुए॥
हे देवी! हम सभी आज,
आकुल हैं नत मस्तक हैं।
व्यक्तित्व तुम्हारा दिग्दर्शक,
पथ पर बढ़ने को आतुर हैं॥

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की कविता

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विस्मृति की धुंध हटाकर के, स्मृति के दीप जला लेना
झांसी की रानी को अपने, अश्कों के अर्घ चढ़ा देना।
आज़ादी की बलिबेदी पर, हँसतें हँसते कुर्बान हुई
उस शूर वीर मर्दानी को, श्रद्धा से शीश झुका देना।
अफ़सोस बड़ा हम भूल गये, गोरों की ख़ूनी चालों को
जो लहू हमारा पीते थे, उन रक्त पिपासु कालों को
जो कालों की भी काल बनी, उसको इक पुष्प चढ़ा देना
उस शूर वीर मर्दानी को, श्रद्धा से शीश झुका देना।
चढ़ अश्व चढ़ाई कर दी जब, झपटी थी मौत इशारों में
मुंडों के मुंड कटे सर से, तेरी तलवार के वारों में
झुंडों में आयें शत्रु दल, अगले पल शीश उड़ा देना
उस शूर वीर मर्दानी को, श्रद्धा से शीश झुका देना।
गर अलख जलाई ना होती, गर आग लगाई ना होती
सन सत्तावन में रानी ने, शमशीर उठाई ना होती
तो इतना था आसान नहीं, आजाद वतन करवा लेना
उस शूर वीर मर्दानी को, श्रद्धा से शीश झुका देना।

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