Kabir ke Dohe in Hindi

कबीर के दोहे – Kabir ke Dohe – TBR

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संत कबीरदास जी एक महान कवी एवं समाज सुधारक थे | लोग उन्हें उनके द्वारा कहे गए दोहो के माध्यम से ज्यादा जानते हैं | उनके दोहे बहुत प्रसिद्ध थे क्यूंकि उनके दोहों में भारत की संस्कृति का वर्णन आता था और उनके दोहे प्रेरणादायक होते थे | उन्होंने अपने दोहों के जरिये समाज में फैली कुरीतियों और भेदभाव को दूर करने की कोशिश की है | आइये जानते हैं उनके द्वारा कहे गए कुछ दोहों के बारे में |

#1 Kabir das ke dohe

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय॥

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

#2 दोहे हिंदी अर्थ सहित

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥

#3 Kabir’s dohe

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥

साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥

#4 kabir ke dohe dharm par 

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥

#5 कबीरदास दोहे

तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

Kabir ke Dohe

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥

#6 दोहे मीठी वाणी

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

#7 Dohe pdf

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

#8 Dohe in english

Kaal Kare So Aaj Kar, Aaj Kare So Ub
Pal Mein Pralaya Hoyegi, Bahuri Karoge Kub

Bura Jo Dekhan Main Chala, Bura Naa Milya Koye
Jo Munn Khoja Apnaa, To Mujhse Bura Naa Koye

#9 कबीर के दोहे डाउनलोड

सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

#10 दोहे मित्रता पर

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥

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