Sher o Shayari

मोमिन खान मोमिन शायरी – Momin Khan Momin Shayari In Hindi & Urdu – Sher o Shayari, Poetry & Ghazal

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मोमिन खान जी का पूरा नाम मोहम्मद मोमिन खान है जिनका जन्म 18 ईंसवी में हुआ था वह भारत के महान उर्दू कवि रह चुके हैं | उन्होंने कई प्रकार के शेर और शायरी और गजलें लिखी है मोहम्मद मोमिन खान हिंदी तथा उर्दू के अलावा फ़ारसी तथा अरबी भाषा पर भी अपनी रचनाएं लिखी हैं | मोमिन खान मोमिन की मृत्यु सन 1852 ईसवी में कोठे में गिरने से हो गई थी इसीलिए हम आपको महान उर्दू के शायर मोमिन खान के द्वारा लिखी गई कुछ बेहतरीन शायरियों के बारे में बताते हैं जिनको पढ़कर आप इनके बारे में काफी कुछ जान सकेंगे |

Momin Khan Momin Best Shayari

अगर आप रेख़्ता पर मोमिन, तुम मेरे पास होते हो गोया, जौक की शायरी, मोमिन meaning, मोमिन की ग़ज़ल, नवाब मिर्ज़ा खान दाग़, गोया कोई दूसरा नहीं होता, momin khan momin in urdu, tum mere paas, momin khan momin poetry with english translation, books, momin khan momin poetry in urdu pdf, momin khan momin date of birth के बारे में जानकारी यहाँ से जान सकते है :

डरता हूँ आसमान से बिजली न गिर पड़े
सय्याद की निगाह सू-ए-आशियाँ नहीं

एजाज़-ए-जाँ-दही है हमारे कलाम को
ज़िंदा किया है हम ने मसीहा के नाम को

आप की कौन सी बढ़ी इज़्ज़त
मैं अगर बज़्म में ज़लील हुआ

उलझा है पाँव यार का ज़ुल्फ़-ए-दराज़ में
लो आप अपने दाम में सय्याद आ गया

उम्र तो सारी कटी इश्क़-ए-बुताँ में ‘मोमिन’
आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे

पैहम सुजूद पा-ए-सनम पर दम-ए-विदा
‘मोमिन’ ख़ुदा को भूल गए इज़्तिराब में

Shayari of Momin Khan Momin

राज़-ए-निहाँ ज़बान-ए-अग़्यार तक न पहुँचा
क्या एक भी हमारा ख़त यार तक न पहुँचा

रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह
अटका कहीं जो आप का दिल भी मिरी तरह

ग़ैरों पे खुल न जाए कहीं राज़ देखना
मेरी तरफ़ भी ग़म्ज़ा-ए-ग़म्माज़ देखना

अब शोर है मिसाल-ए-जूदी इस ख़िराम को
यूँ कौन जानता था क़यामत के नाम को

कुछ क़फ़स में इन दिनों लगता है जी
आशियाँ अपना हुआ बर्बाद क्या

क्या जाने क्या लिखा था उसे इज़्तिराब में
क़ासिद की लाश आई है ख़त के जवाब में

Momin Khan Momin ki Shayari

ताब-ए-नज़्ज़ारा नहीं आइना क्या देखने दूँ
और बन जाएँगे तस्वीर जो हैराँ होंगे

चारा-ए-दिल सिवाए सब्र नहीं
सो तुम्हारे सिवा नहीं होता

चल दिए सू-ए-हरम कू-ए-बुताँ से ‘मोमिन’
जब दिया रंज बुतों ने तो ख़ुदा याद आया

तू कहाँ जाएगी कुछ अपना ठिकाना कर ले
हम तो कल ख़्वाब-ए-अदम में शब-ए-हिज्राँ होंगे

‘मोमिन’ ख़ुदा के वास्ते ऐसा मकाँ न छोड़
दोज़ख़ में डाल ख़ुल्द को कू-ए-बुताँ न छोड़

तुम हमारे किसी तरह न हुए
वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता

मोमिन खान मोमिन शायरी

मोमिन ख़ाँ मोमिन ग़ज़ल इन हिंदी

ले शब-ए-वस्ल-ए-ग़ैर भी काटी
तू मुझे आज़माएगा कब तक

कल तुम जो बज़्म-ए-ग़ैर में आँखें चुरा गए
खोए गए हम ऐसे कि अग़्यार पा गए

किस पे मरते हो आप पूछते हैं
मुझ को फ़िक्र-ए-जवाब ने मारा

किसी का हुआ आज कल था किसी का
न है तू किसी का न होगा किसी का

माशूक़ से भी हम ने निभाई बराबरी
वाँ लुत्फ़ कम हुआ तो यहाँ प्यार कम हुआ

तुम मिरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता

Urdu Shayari By Momin Khan Momin

गो आप ने जवाब बुरा ही दिया वले
मुझ से बयाँ न कीजे अदू के पयाम को

हम समझते हैं आज़माने को
उज़्र कुछ चाहिए सताने को

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो

हँस हँस के वो मुझ से ही मिरे क़त्ल की बातें
इस तरह से करते हैं कि गोया न करेंगे

हाल दिल यार को लिक्खूँ क्यूँकर
हाथ दिल से जुदा नहीं होता

हाल-ए-दिल यार को लिखूँ क्यूँकर
हाथ दिल से जुदा नहीं होता

Momin Khan Momin Shayari Urdu

हाथ टूटें मैं ने गर छेड़ी हों ज़ुल्फ़ें आप की
आप के सर की क़सम बाद-ए-सबा थी मैं न था

है कुछ तो बात ‘मोमिन’ जो छा गई ख़मोशी
किस बुत को दे दिया दिल क्यूँ बुत से बन गए हो

ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम
पर क्या करें कि हो गए नाचार जी से हम

उस नक़्श-ए-पा के सज्दे ने क्या क्या किया ज़लील
मैं कूचा-ए-रक़ीब में भी सर के बल गया

हो गए नाम-ए-बुताँ सुनते ही ‘मोमिन’ बे-क़रार
हम न कहते थे कि हज़रत पारसा कहने को हैं

हो गया राज़-ए-इश्क़ बे-पर्दा
उस ने पर्दे से जो निकाला मुँह

साहब ने इस ग़ुलाम को आज़ाद कर दिया
लो बंदगी कि छूट गए बंदगी से हम

Momin Khan Momin Shayari In Hindi

मोमिन की शायरी इन हिंदी

मैं भी कुछ ख़ुश नहीं वफ़ा कर के
तुम ने अच्छा किया निबाह न की

मज्लिस में मिरे ज़िक्र के आते ही उठे वो
बदनामी-ए-उश्शाक़ का एज़ाज़ तो देखो

ने जाए वाँ बने है ने बिन जाए चैन है
क्या कीजिए हमें तो है मुश्किल सभी तरह

वो आए हैं पशेमाँ लाश पर अब
तुझे ऐ ज़िंदगी लाऊँ कहाँ से

बहर-ए-अयादत आए वो लेकिन क़ज़ा के साथ
दम ही निकल गया मिरा आवाज़-ए-पा के साथ

थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब
वो आए तो भी नींद न आई तमाम शब

मोमिन के शेर

मेरे तग़ईर-ए-रंग को मत देख
तुझ को अपनी नज़र न हो जाए

शब जो मस्जिद में जा फँसे ‘मोमिन’
रात काटी ख़ुदा ख़ुदा कर के

न करो अब निबाह की बातें
तुम को ऐ मेहरबान देख लिया

गो कि हम सफ़्हा-ए-हस्ती पे थे एक हर्फ़-ए-ग़लत
लेकिन उठ्ठे भी तो इक नक़्श बिठा कर उठे

इतनी कुदूरत अश्क में हैराँ हूँ क्या कहूँ
दरिया में है सराब कि दरिया सराब में

दीदा-ए-हैराँ ने तमाशा किया
देर तलक वो मुझे देखा किया

Momin Khan Momin Ghazals Tashreeh

नासेहा दिल में तो इतना तू समझ अपने कि हम
लाख नादाँ हुए क्या तुझ से भी नादाँ होंगे

माँगा करेंगे अब से दुआ हिज्र-ए-यार की
आख़िर तो दुश्मनी है असर को दुआ के साथ

महशर में पास क्यूँ दम-ए-फ़रियाद आ गया
रहम उस ने कब किया था कि अब याद आ गया

दुश्नाम-ए-यार तब्-ए-हज़ीं पर गिराँ नहीं
ऐ हम-नशीं नज़ाकत-ए-आवाज़ देखना

उस ग़ैरत-ए-नाहीद की हर तान है दीपक
शोला सा लपक जाए है आवाज़ तो देखो

मोमिन मैं अपने नालों के सदक़े कि कहते हैं
उस को भी आज नींद न आई तमाम शब

बे-ख़ुद थे ग़श थे महव थे दुनिया का ग़म न था
जीना विसाल में भी तो हिज्राँ से कम न था

है किस का इंतिज़ार कि ख़्वाब-ए-अदम से भी
हर बार चौंक पड़ते हैं आवाज़-ए-पा के साथ

धो दिया अश्क-ए-नदामत ने गुनाहों को मिरे
तर हुआ दामन तो बारे पाक दामन हो गया

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