पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार – Pandit Deendayal Upadhyay Quotes in Hindi

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पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी साहित्यकार व राजनीतिज्ञ थे उन्होंने भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष पद पर 1967 से लेकर 1968 तक कार्य किया | उनका जन्म २५ सितम्बर १९१६ को ब्रिटिश भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में तथा मृत्यु ११ फ़रवरी १९६८ स्वतन्त्र भारत में मुगलसराय के आसपास रेल में हत्या में हुई थी | पंडित जी एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा के व्यक्ति थे जिसके लिए उनके द्वारा बताये गए विचार आज हमारे लिए प्रेरणादायक सिद्ध होते है | इसीलिए अगर आप उनके कुछ बेहतरीन कोट्स के बारे में जानना चाहते है तो यहाँ से जान सकते है |

पं दीनदयाल उपाध्याय के विचार

पश्चिमी विज्ञान और पश्चिमी जीवन शैली दो अलग-अलग चीजें हैं. चूँकि पश्चिमी विज्ञान सार्वभौमिक है और हम आगे बढ़ने के लिए इसे अपनाना चाहिए, लेकिन पश्चिमी जीवनशैली और मूल्यों के सन्दर्भ में यह सच नहीं है

पिछले 1000 वर्षों में जबरदस्ती या अपनी इच्छा से, चाहे जो कुछ भी हमने ग्रहण किया है – अब उसे ख़ारिज नहीं किया जा सकता

आजादी केवल तभी सार्थक हो सकती है, जब यह हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति का जरिया बनती है

Deen Dayal Upadhyaya Quotes

यहाँ भारत में, व्यक्ति के एकीकृत प्रगति को हासिल के विचार से, हम स्वयं से पहले शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की चौगुनी आवश्यकताओं की पूर्ति का आदर्श रखते हैं

मानवीय और राष्ट्रीय दोनों तरह से, यह आवश्यक हो गया है कि हम भारतीय संस्कृति के सिद्धांतों के बारे में सोचें

धर्म के लिए निकटतम समान अंग्रेजी शब्द ‘जन्मजात कानून’ हो सकता है. हालाँकि यह भी धर्म के पूरा अर्थ को व्यक्त नहीं करता है. चूँकि धर्म सर्वोच्च है, हमारे राज्य के लिए आदर्श ‘धर्म का राज्य’ होना चाहिए

पं दीनदयाल उपाध्याय के विचार

दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक विचार

जब अंग्रेज हम पर राज कर रहे थे, तब हमने उनके विरोध में गर्व का अनुभव किया, लेकिन हैरत की बात है कि अब जबकि अंग्रेज चले गए हैं, पश्चिमीकरण प्रगति का पर्याय बन गया है

धर्म एक बहुत व्यापक अवधारणा है जो समाज को बनाए रखने के जीवन के सभी पहलुओं से संबंधित है

समाज को हर व्यक्ति को ढंग शिक्षित करना होगा, तभी वह समाज के प्रति दायित्वों को पूरा करने में करने सक्षम होगा

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के आर्थिक विचार

शक्ति अनर्गल व्यवहार में व्यय न हो बल्कि अच्छी तरह विनियमित कार्रवाई में निहित होनी चाहिए

जब स्वभाव को धर्म के सिद्धांतों के अनुसार बदला जाता है, तो हमें संस्कृति और सभ्यता प्राप्त होते हैं

एक राष्ट्र लोगों का एक समूह होता है जो एक लक्ष्य’,’एक आदर्श’,’एक मिशन’ के साथ जीते हैं और एक विशेष भूभाग को अपनी मातृभूमि के रूप में देखते हैं. यदि आदर्श या मातृभूमि दोनों में से किसी का भी लोप हो तो एक राष्ट्र संभव नहीं हो सकता

दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक विचार

दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा

जीवन में विविधता और बहुलता है लेकिन हमने हमेशा उनके पीछे छिपी एकता को खोजने का प्रयास किया है

हम लोगों ने अंग्रेजी वस्तुओं का विरोध करने में तब गर्व महसूस किया था जब वे (अंग्रेज ) हम पर शाशन करते थे , पर हैरत की बात है , अब जब अंग्रेज जा चुके हैं , पश्चिमीकरण प्रगति का पर्याय बन चुका है

धर्म के मूल सिद्धांत शाश्वत और सार्वभौमिक हैं. हालांकि , उनका क्रियान्वन समय , स्थान और परिस्थितियों के अनुसार अलग -अलग हो सकता है

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनमोल विचार

हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारत माता हैं, केवल भारत ही नहीं. माता शब्द हटा दीजिये तो भारत केवल जमीन का टुकड़ा मात्र बनकर रह जायेगा

जब राज्य में समस्त शक्तियां समाहित होती हैं – राजनीतिक और आर्थिक दोनों – परिणामस्वरुप धर्म की गिरावट होता है

भगवान ने हर आदमी को हाथ दिये हैं, लेकिन हाथों की खुद से उत्पादन करने की एक सीमित क्षमता है. उनकी सहायता के लिए मशीनों के रूप में पूंजी की जरूरत है

Pandit Deendayal Upadhyay Quotes in Hindi

दीनदयाल उपाध्याय कोट्स इन हिंदी

धर्म बहुत व्यापक अवधारणा है जो समाज को बनाए रखने के लिये जीवन के सभी पहलुओं से संबंधित है

आजादी सार्थक तभी हो सकती है जब यह हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति का साधन बन जाए

एक बीज , जड़ों , तानों , शाखाओं , पत्तियों , फूलों और फलों के रूप में अभिवयक्त होता है . इन सभी के अलग -अलग रूप , रंग और गुण होते हैं . फिर भी हम बीज के माध्यम से उनकी एकता के सम्बन्ध को पहचानते हैं

Hindi Quotes By Deen Dayal Upadhyaya

संघर्ष सांस्कृतिक स्वभाव का एक संकेत नहीं है बल्कि यह उनके गिरावट का एक लक्षण है

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (मानव प्रयास के चार प्रकार) की लालसा व्यक्ति में जन्मगत होता है और इनमें संतुष्टि एकीकृत रूप से भारतीय संस्कृति का सार है

भारत के सामने समस्याएँ आने का प्रमुख कारण, अपनी ‘राष्ट्रीय पहचान’ की उपेक्षा है

Deen Dayal Upadhyaya Quotes

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के अनमोल वचन

धर्म के मौलिक सिद्धांत अनन्त और सार्वभौमिक हैं. हालांकि, उनके कार्यान्वयन का समय और स्थान परिस्थितियों के अनुसार भिन्न हो सकती है

मानव प्रकृति में दोनों प्रवृत्तियां रही हैं – एक ओर क्रोध और लालच तो दूसरी ओर प्रेम और बलिदान

बीज की एक इकाई विभिन्न रूपों में प्रकट होती है – जड़ें, तना, शाखाएं, पत्तियां, फूल और फल. इन सबके रंग और गुण अलग-अलग होते हैं. फिर भी बीज के द्वारा हम इन सबके एकत्व के रिश्ते को पहचान लेते हैं

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के प्रेरक सुविचार

मानवीय स्वभाव में दोनों प्रवृतियाँ हैं – क्रोध और लालच एक हाथ पर तो दूसरे पर प्यार और बलिदान

विविधता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति भारतीय संस्कृति की विचारधारा में रची- बसी हुई है

हेगेल ने थीसिस, एंटी थीसिस और संश्लेषण के सिद्धांतों को आगे रखा, कार्ल मार्क्स ने इस सिद्धांत को एक आधार के रूप में इस्तेमाल किया और इतिहास और अर्थशास्त्र के अपने विश्लेषण को प्रस्तुत किया, डार्विन ने योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धांत को जीवन का एकमात्र आधार माना; लेकिन हमने इस देश में सभी जीवों की मूलभूत एकात्म देखा है

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