Essay (Nibandh)

गुरु पूर्णिमा पर निबंध – Guru Purnima Bhashan in Hindi & Marathi – Guru Purnima Nibandh

Guru Purnima bhashan in Hindi

Guru Purnima 2019: भारतीय लोग अपने गुरुओं के लिए बहुत सम्मान रखते हैं। यह शब्द अपने आप में बहुत महत्व और कद रखता है। भारत में एक गुरु एक पूजनीय व्यक्ति है जिसका ज्ञान और ज्ञान हमें जीवन की यात्रा में प्रबुद्ध करता है। यह त्योहार हिंदू और बौद्ध दोनों द्वारा मनाया जाता है। इस दिन का महत्व यह है कि गुरु किसी के जीवन में सबसे आवश्यक स्थान रखता है और उसे सम्मान और सम्मान देने के लिए लोग गुरु पूर्णिमा मनाते हैं।

Guru Purnima Essay in Hindi

गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर, विश्व के समस्त गुरुजनों को मेरा शत् शत् नमन। गुरु के महत्व को हमारे सभी संतो, ऋषियों एवं महान विभूतियों ने उच्च स्थान दिया है।संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ होता है अंधकार (अज्ञान)एवं ‘रु’ का अर्थ होता है प्रकाश(ज्ञान)। गुरु हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं।

हमारे जीवन के प्रथम गुरु हमारे माता-पिता होते हैं। जो हमारा पालन-पोषण करते हैं, सांसारिक दुनिया में हमें प्रथम बार बोलना, चलना तथा शुरुवाती आवश्यकताओं को सिखाते हैं। अतः माता-पिता का स्थान सर्वोपरी है। जीवन का विकास सुचारू रूप से सतत् चलता रहे उसके लिये हमें गुरु की आवश्यकता होती है। भावी जीवन का निर्माण गुरू द्वारा ही होता है।

मानव मन में व्याप्त बुराई रूपी विष को दूर करने में गुरु का विषेश योगदान है। महर्षि वाल्मिकी जिनका पूर्व नाम ‘रत्नाकर’ था। वे अपने परिवार का पालन पोषण करने हेतु दस्युकर्म करते थे। महर्षि वाल्मिकी जी ने रामायण जैसे महाकाव्य की रचना की, ये तभी संभव हो सका जब गुरू रूपी नारद जी ने उनका ह्दय परिर्वतित किया। मित्रों, पंचतंत्र की कथाएं हम सब ने पढी या सुनी होगी। नीति कुशल गुरू विष्णु शर्मा ने किस तरह राजा अमरशक्ती के तीनों अज्ञानी पुत्रों को कहानियों एवं अन्य माध्यमों से उन्हें ज्ञानी बना दिया।

गुरू शिष्य का संबन्ध सेतु के समान होता है। गुरू की कृपा से शिष्य के लक्ष्य का मार्ग आसान होता है।

स्वामी विवेकानंद जी को बचपन से परमात्मा को पाने की चाह थी। उनकी ये इच्छा तभी पूरी हो सकी जब उनको गुरू परमहंस का आर्शिवाद मिला। गुरू की कृपा से ही आत्म साक्षात्कार हो सका।

गुरू द्वारा कहा एक शब्द या उनकी छवि मानव की कायापलट सकती है। मित्रों, कबीर दास जी का अपने गुरू के प्रति जो समर्पण था उसको स्पष्ट करना आवश्यक है क्योंकि गुरू के महत्व को सबसे ज्यादा कबीर दास जी के दोहों में देखा जा सकता है।

एक बार रामानंद जी गंगा स्नान को जा रहे थे, सीढी उतरते समय उनका पैर कबीर दास जी के शरीर पर पङ गया। रामानंद जी के मुख से ‘राम-राम’ शब्द निकल पङा। उसी शब्द को कबीर दास जी ने दिक्षा मंत्र मान लिया और रामानंद जी को अपने गुरू के रूप में स्वीकार कर लिया। कबीर दास जी के शब्दों में— ‘हम कासी में प्रकट हुए, रामानंद चेताए’। ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि जीवन में गुरू के महत्व का वर्णन कबीर दास जी ने अपने दोहों में पूरी आत्मियता से किया है।

Guru Purnima Nibandh in Gujarati

ભારતમાં યોજાયેલી સૌથી મહત્વપૂર્ણ તહેવારોમાં ગુરૂ પૂર્ણિમા છે. તે બૌદ્ધ માટે એક તહેવાર છે. ગુરુ પૂર્ણિમા મૂળભૂત રીતે એક રસ્તો છે જેના દ્વારા વિદ્યાર્થીઓ તેમના ગુરુ અથવા શિક્ષક પ્રત્યેના પ્રેમ અને કૃતજ્ઞતા દર્શાવે છે. આ તહેવાર હિન્દૂ કૅલેન્ડર મુજબ ઉજવાય છે, જે અશાદના પ્રથમ પૂર્ણ ચંદ્ર દિવસ પર છે અથવા અંગ્રેજી કૅલેન્ડર મુજબ જુલાઈનો મહિનો છે. ભારતીય વિજ્ઞાન મુજબ, ગુરુ શબ્દ બે સંસ્કૃત શબ્દો “ગુ” અને “રૂ” જેનો અર્થ ભૂતપૂર્વ અર્થ અજ્ઞાનતા અને એક વ્યક્તિમાં અંધકાર અને પછીનો અર્થ છે જે દૂર કરે છે એટલે ગુરુનો અર્થ એ વ્યક્તિ છે હિન્દુ ધર્મ અનુસાર, ગુરુ પૂર્ણિમાનો તહેવાર ગુરુ વ્યાસને ઉજવવામાં આવે છે. ગુરુ વ્યાસ એ વ્યક્તિ છે જેમણે 4 વેદ, 18 પુરાણ અને મહાભારત લખ્યા છે.

ગુરુ પૂર્ણિમાની ઉજવણી લોકો દ્વારા જોઈ શકાય તે કંઈક છે. ત્યાં ઘણી શાળાઓ છે જે પરંપરાગત રીતે આ તહેવારને ગુરુના પગ ધોવાથી ઉજવે છે, જેમાં હિનુ શબ્દને “પદપુજા” કહેવામાં આવે છે. તે પછી શિષ્યો દ્વારા આયોજીત ઘણા કાર્યક્રમો છે જેમાં શાસ્ત્રીય ગીતો, નૃત્ય, હવાન, કીર્તન અને ગિઆના પઠનનો સમાવેશ થાય છે. ફૂલોના સ્વરૂપમાં વિવિધ ભેટો અને ગુરુને આપવામાં આવેલા “ઉતરિયા” (એક પ્રકારનું ચોરી)
બીજી તરફ બૌદ્ધ લોકો તેમના આગેવાન ભગવાન બુદ્ધના માનમાં આ દિવસે ઉજવે છે. તેઓ આ દિવસે ચિંતન કરે છે અને ભગવાન બુદ્ધની ઉપદેશો વાંચે છે. તેઓ “ઉપોસ્તા” નું પણ પાલન કરે છે, જે આ દિવસે એક બૌદ્ધ સંપ્રદાય છે.

गुरु पूर्णिमा निबंध मराठी

Guru Purnima Essay in Hindi

भारतीय गुरुपरंपरेत गुरु-शिष्यांच्या जोड्या प्रसिद्ध आहेत. जनक-याज्ञवल्क्य, शुक्राचार्य-जनक, कृष्ण, सुदामा-सांदिपनी, विश्वामित्र-राम, लक्ष्मण, परशुराम-कर्ण, द्रोणाचार्य-अर्जुन अशी गुरु-शिष्य परंपरा आहे. मात्र एकलव्याची गुरुनिष्ठा पाहिली की, सर्वांचेच मस्तक नम्र झाल्याशिवाय राहत नाही.

भगवान श्रीकृष्णांनी गुरूच्या घरी लाकडे वाहिली. संत ज्ञानेश्वरांनी वडीलबंधू निवृत्तीनाथ यांनाच आपले गुरु मानले, तर संत नामदेव साक्षात विठ्ठलाशी भाष्य करीत असत. त्या नामदेवांचे गुरु होते विसोबा खेचर. भारतीय संस्कृतीत गुरूला नेहमीच पूजनीय मानले आहे.

गुरुपौर्णिमा ही सद्गुरूंची पौर्णिमा मानली जाते. पौर्णिमा म्हणजे प्रकाश. गुरु शिष्याला ज्ञान देतात. तो ज्ञानाचा प्रकाश आपल्यापर्यंत पोहोचावा, म्हणून गुरूची प्रार्थना करावयाची, तो हा दिवस होय.

गुरु म्हणजे ज्ञानाचा सागर आहे. जलाशयात पाणी विपुल आहे, परंतु घटाने-घागरीने आपली मान खाली केल्याशिवाय म्हणजे विनम्र झाल्याशिवाय पाणी मिळू शकत नाही. त्याप्रमाणे गुरूजवळ शिष्याने नम्र झाल्याविना त्याला ज्ञान प्राप्त होणार नाही, हे सर्वांनी लक्षात ठेवावे. ‘गुरु बिन ज्ञान कहासे लाऊ?’ हेच खरे आहे.

गुरूंच्या उपकारांनी आपले मन कृतज्ञतेने भरून येते, तेव्हा आपल्या तोंडून श्लोक बाहेर पडतो –

गुरुर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः ll
गुरु साक्षात परब्रम्ह तस्मै श्री गुरवे नमः ll

अनेक विद्यालयांतून, महाविद्यालयांतून श्रद्धाशील विद्यार्थी आपापल्या गुरुजनांसमोर या दिवशी विनम्र भावनेने नतमस्तक होतात. वेगवेगळ्या पंथोपपंथांतून ईश्वरभक्तीकडे जाण्याचे मार्ग शोधणारे मुमुक्षू-पारमार्थिक या दिवशी आपल्या गुरुंचे भक्तिभावाने पूजन करतात. ज्यांना या ना त्या कारणांमुळे गुरुंचे समक्ष दर्शन वा सहवास घडू शकत नाही ते त्यांच्या प्रतिमेची पूजा करतात.

Guru Purnima Bhashan in Hindi

गुरू पूर्णिमा का पर्व पूरे देश मनाया जाना स्वाभाविक है। भारतीय अध्यात्म में गुरु का अत्ंयंत महत्व है। सच बात तो यह है कि आदमी कितने भी अध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ ले जब तक उसे गुरु का सानिध्य या नाम के अभाव में ज्ञान कभी नहीं मिलेगा वह कभी इस संसार का रहस्य समझ नहीं पायेगा। इसके लिये यह भी शर्त है कि गुरु को त्यागी और निष्कामी होना चाहिये। दूसरी बात यह कि गुरु भले ही कोई आश्रम वगैरह न चलाता हो पर अगर उसके पास ज्ञान है तो वही अपने शिष्य की सहायता कर सकता है। यह जरूरी नही है कि गुरु सन्यासी हो, अगर वह गृहस्थ भी हो तो उसमें अपने त्याग का भाव होना चाहिये। त्याग का अर्थ संसार का त्याग नहीं बल्कि अपने स्वाभाविक तथा नित्य कर्मों में लिप्त रहते हुए विषयों में आसक्ति रहित होने से है।

हमारे यहां गुरु शिष्य परंपरा का लाभ पेशेवर धार्मिक प्रवचनकर्ताओं ने खूब लाभ उठाया है। यह पेशेवर लोग अपने इर्दगिर्द भीड़ एकत्रित कर उसे तालियां बजवाने के लिये सांसरिक विषयों की बात खूब करते हैं। श्रीमद्भागवतगीता में वर्णित गुरु सेवा करने के संदेश वह इस तरह प्रयारित करते हैं जिससे उनके शिष्य उन पर दान दक्षिण अधिक से अधिक चढ़ायें। इतना ही नहीं माता पिता तथा भाई बहिन या रिश्तों को निभाने की कला भी सिखाते हैं जो कि शुद्ध रूप से सांसरिक विषय है। श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार हर मनुष्य अपना गृहस्थ कर्तव्य निभाते हुए अधिक आसानी से योग में पारंगत हो सकता है। सन्यास अत्यंत कठिन विधा है क्योंकि मनुष्य का मन चंचल है इसलिये उसमें विषयों के विचार आते हैं। अगर सन्यास ले भी लिया तो मन पर नियंत्रण इतना सहज नहीं है। इसलिये सरलता इसी में है कि गृहस्थी में रत होने पर भी विषयों में आसक्ति न रखते हुए उनसे इतना ही जुड़ा रहना चाहिये जिससे अपनी देह का पोषण होता रहे। गृहस्थी में माता, पिता, भाई, बहिन तथा अन्य रिश्ते ही होते हैं जिन्हें तत्वज्ञान होने पर मनुष्य अधिक सहजता से निभाता है। हमारे कथित गुरु जब इस तरह के सांसरिक विषयों पर बोलते हैं तो महिलायें बहुत प्रसन्न होती हैं और पेशेवर गुरुओं को आजीविका उनके सद्भाव पर ही चलती है। समाज के परिवारों के अंदर की कल्पित कहानियां सुनाकर यह पेशेवक गुरु अपने लिये खूब साधन जुटाते हैं। शिष्यों का संग्रह करना ही उनका उद्देश्य ही होता है। यही कारण है कि हमारे देश में धर्म पर चलने की बात खूब होती है पर जब देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, अपराध तथा शोषण की बढ़ती घातक प्रवृत्ति देखते हैं तब यह साफ लगता है कि पाखंडी लोग अधिक हैं।

गुरु पूर्णिमा पर भाषण

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गुरु पौर्णिमा हे भारतातील प्रसिद्ध सणांपैकी एक आहे. हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है इसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है के इस दिन भगवान वेद व्यास ने महाभारत की रचना की थी यह त्यौहार पूरे भारत में हा मोठा उत्साह आणि आदराने साजरा केला जातो. गुरु पौर्णिमाचा हा उत्सव गुरुला आदर आणि समर्पण करण्याचा सण आहे. असे मानले जाते की या दिवशी गुरूंच्या हृदयाच्या उपासनेला गुरुची सुरुवात करण्याची कृपा होते. या दिवशी बरेच लोक त्यांच्या गुरुसाठी उपास करीत असतात.

असे मानले जाते की जेव्हा प्राचीन काळात प्राचीन काळापासून विद्वानांनी आपल्या गुरुकडून संपूर्ण शिक्षण घेतले, तेव्हा या उत्सवाच्या वेळी त्यांनी आपल्या उपासनेत दक्षिणा देऊन आपल्या गुरुची उपासना केली. आश्रमात, उपासनेची व सेवेची विशेष सेवा वापरली जात असे आणि अनेकांना आपल्या धन्याच्या नावात दान देण्याकरिता वापरले जात असे.

सिख धर्म में गुरु पूर्णिमा (गुरु पौर्णिमा) का विशेष महत्व है क्योंकि सिख धर्म में दस गुरुओं का अपना विशेष महत्व है शास्त्रों में गुरु का अर्थ है गु यानी के अंधकार और रु का अर्थ होता है प्रकाश मतलब के गुरु एक इंसान को अज्ञान रुपी अंधकार ज्ञान पासून प्रकाश रक्कम दिशेने ला.

गुरुला समर्पित केलेले हा सण म्हणजे आपल्या गुरुसाठी प्रेम आणि श्रद्धा बाळगून ठेवा.

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