Poem (कविता)

Makhanlal Chaturvedi Poems in Hindi – माखनलाल चतुर्वेदी की हिन्दी कविताएँ

Makhanlal Chaturvedi Poems in Hindi

माखनलाल चतुर्वेदी एक भारतीय कवि, पत्रकार व लेखक थे इनका जन्म ४ अप्रैल १८८८ में बाबई, होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ व इनकी मृत्यु ३० जनवरी १९६८ में हुई थी | इनके द्वारा की गयी रचनाओं के लिए इन्हे सन १९६३ में भारत सरकार द्वारा ‘पद्मभूषण’ जैसे पुरूस्कार से सम्मानित किया गया था | इसीलिए हम आपको इनके द्वारा लिखी गयी कुछ बेहतरीन कविताओं के बारे में बताते है जिन कविताओं के बारे में जानने के लिए आप हमारे द्वारा बताई गयी इस जानकारी को पढ़ सकते है |

माखनलाल चतुर्वेदी कविता कोश – Makhanlal Chaturvedi Kavita Kosh

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यह अँगूठी सखि निरख एकान्त की,
जड़ चलो हीरा उपस्थिति का, सुहागन जड़ चलो।
दामिनी भुज की–सयम की–अँगुली छिगुनी,
पहिन कर बैठे जरा नीलम भरे जल-खेत में,
साढ़साती हो, पहिन लो समय,
नग जड़ी, नीलम लगी है यह अँगूठी!
नील तुम, फिर नील नग, फिर नील नभ,
फिर नील सागर, नीलिमा के घर
अनोखी नीलिमा की छवि
सलोनी नीलिमा के घर
पधारे आज
नीतोत्पल सदृश भगवान मेरे!
और पानी हों बरसते गान मेरे!
लुट गये नभ के दिये वरदान मेरे!
अब हँसा तो, बिजलियाँ चमकें,
कि हीरक हार दीखे,
फिर यशोदा को कि माटी भरे मुख में
प्यार दीखे, ज्वार दीखे!
और नव संसार दीखे।

Poem by Makhanlal Chaturvedi In Hindi

अरे निवासी अन्तरतर के
हृदय-खण्ड जीवन के लाल
त्रास और उपहास सभी में
रहा पुतलियाँ किये निहाल।
संकट में वह गोद, मोद कर
जहाँ टपकता धन्य रहा,
मार-मार में गिर न हठीले
निर्जन है, मैं वन्य रहा।
ठहर जरा तुझ से प्यारे के
चरण कमल धुल जाने दे
और जोर से सिसक सकूँ
वे मंजुल घड़ियाँ आने दे।

माखनलाल चतुर्वेदी की रचनाएँ

तुम मन्द चलो,
ध्वनि के खतरे बिखरे मग में-
तुम मन्द चलो।
सूझों का पहिन कलेवर-सा,
विकलाई का कल जेवर-सा,
घुल-घुल आँखों के पानी में-
फिर छलक-छलक बन छन्द चलो।
पर मन्द चलो।
प्रहरी पलकें? चुप, सोने दो!
धड़कन रोती है? रोने दो!
पुतली के अँधियारे जग में-
साजन के मग स्वच्छन्द चलो।
पर मन्द चलो।
ये फूल, कि ये काँटे आली,
आये तेरे बाँटे आली!
आलिंगन में ये सूली हैं-
इनमें मत कर फर-फन्द चलो।
तुम मन्द चलो।
ओठों से ओठों की रूठन,
बिखरे प्रसाद, छुटे जूठन,
यह दण्ड-दान यह रक्त-स्नान,
करती चुपचाप पसंद चलो।
पर मन्द चलो।
ऊषा, यह तारों की समाधि,
यह बिछुड़न की जगमगी व्याधि,
तुम भी चाहों को दफनाती,
छवि ढोती, मत्त गयन्द चलो।
पर मन्द चलो।
सारा हरियाला, दूबों का,
ओसों के आँसू ढाल उठा,
लो साथी पाये-भागो ना,
बन कर सखि, मत्त मरंद चलो।
तुम मन्द चलो।
ये कड़ियाँ हैं, ये घड़ियाँ हैं
पल हैं, प्रहार की लड़ियाँ हैं
नीरव निश्वासों पर लिखती-
अपने सिसकन, निस्पन्द चलो।
तुम मन्द चलो।

माखनलाल चतुर्वेदी की हिन्दी कविताएँ

Makhanlal Chaturvedi Poem Pushp Ki Abhilasha in Hindi

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हटा न सकता हृदय-देश से तुझे मूर्खतापूर्ण प्रबोध,
हटा न सकता पगडंडी से उन हिंसक पशुओं का क्रोध,
होगा कठिन विरोध करूँगा मैं निश्वय-निष्क्रिय-प्रतिरोध
तोड़ पहाड़ों को लाऊँगा उस टूटी कुटिया का बोध।
चूकेंगें आगे आने पर सारे दाँव विधाता के,
धोऊँगा पद-कंज आँसुओं से मैं जीवन-दाता के।

क्या आकाश उतर आया है
दूबों के दरबार में
नीली भूमि हरि हो आई
इस किरणों के ज्वार में।
क्या देखें तरुओं को, उनके
फूल लाल अंगारे हैं
वन के विजन भिखारी ने
वसुधा में हाथ पसारे हैं।
नक्शा उतर गया है बेलों
की अलमस्त जवानी का
युद्ध ठना, मोती की लड़ियों
से दूबों के पानी का।
तुम न नृत्य कर उठो मयूरी
दूबों की हरियाली पर
हंस तरस खायें उस-
मुक्ता बोने वाले माली पर।
ऊँचाई यों फिसल पड़ी है
नीचाई के प्यार में,
क्या आकाश उतर आया है
दूबों के दरबार में?

Makhanlal Chaturvedi Ki Desh Bhakti Kavita

मधुर! तुम्हारा चित्र बन गया
कुछ नीले कुछ श्वेत गगन पर
हरे-हरे घन श्यामल वन पर
द्रुत असीम उद्दण्ड पवन पर
चुम्बन आज पवित्र बन गया,
मधुर! तुम्हारा चित्र बन गया।
तुम आए, बोले, तुम खेले
दिवस-रात्रि बांहों पर झेले
साँसों में तूफान सकेले
जो ऊगा वह मित्र बन गया,
मधुर! तुम्हारा चित्र बन गया।
ये टिमटिम-पंथी ये तारे
पहरन मोती जड़े तुम्हारे
विस्तृत! तुम जीते हम हारे!
चाँद साथ सौमित्र बन गया।
मधुर! तुम्हारा चित्र बन गया।

माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य की विशेषता

धमनी से मिस धड़कन की
मृदुमाला फेर रहे? बोलो!
दाँव लगाते हो? घिर-घिर कर
किसको घेर रहे? बोलो!
माधव की रट है? या प्रीतम-
प्रीतम टेर रहे? बोलो!
या आसेतु-हिमाचल बलि-
का बीज बखेर रहे? बोलो!
या दाने-दाने छाने जाते
गुनाह गिन जाने को,
या मनका मनका फिरता
जीवन का अलाव जगाने को।

माखनलाल चतुर्वेदी कविता कोश

माखनलाल चतुर्वेदी की कविता

क्या आकाश उतर आया है
दूबों के दरबार में?
नीली भूमि हरी हो आई
इस किरणों के ज्वार में !
क्या देखें तरुओं को उनके
फूल लाल अंगारे हैं;
बन के विजन भिखारी ने
वसुधा में हाथ पसारे हैं।
नक्शा उतर गया है, बेलों
की अलमस्त जवानी का
युद्ध ठना, मोती की लड़ियों से
दूबों के पानी का!
तुम न नृत्य कर उठो मयूरी,
दूबों की हरियाली पर;
हंस तरस खाएँ उस मुक्ता
बोने वाले माली पर!
ऊँचाई यों फिसल पड़ी है
नीचाई के प्यार में!
क्या आकाश उतर आया है
दूबों के दरबार में?

अपना आप हिसाब लगाया
पाया महा दीन से दीन,
डेसिमल पर दस शून्य जमाकर
लिखे जहाँ तीन पर तीन।
इतना भी हूँ क्या? मेरा मन
हो पाया निःशंक नहीं,
पर मेरे इस महाद्वीप का
इससे छोटा अंक नहीं!
भावों के धन, दाँवों के ॠण,
बलिदानों में गुणित बना,
और विकारों से भाजित कर
शुद्ध रूप प्यारे अपना!

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