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Subhash Chandra Bose Essay – सुभाष चंद्र बोस पर निबंध | Subhash Chandra Bose Essay in Hindi

Subhash Chandra Bose Essay in Hindi

सुभास चंद्र बोस भारतीय इतिहास में एक बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति और बहादुर स्वतंत्रता सेनानी थे। स्वतंत्रता संग्राम के उनके महान योगदान भारत के इतिहास में अविस्मरणीय हैं। वह भारत के एक असली बहादुर नायक थे जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए अपना घर और आराम हमेशा के लिए छोड़ दिया था। उन्होंने हमेशा हिंसा में विश्वास किया और ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता पाने के लिए सशस्त्र विद्रोह का रास्ता चुना। हर वर्ष सुभाष चंद्रबोस जयंती उनकी महानता दर्शाने के लिए मनाई जाती है|

Subhash chandra bose essay in english

subhash chandra bose jayanti date:हर वर्ष सुभाष चंद्रबोस जयंती 23 जनवरी को मनाई जाती है|

Subhas Chandra Bose was a most famous legendary figure and brave freedom fighter in the Indian history. His great contributions of freedom struggle are unforgettable in the history of India. He was a real brave hero of the India who had left his home and comfort forever for his motherland. He always believed in violence and chose way of an armed rebellion to get independence from British rule.
He was born in Cuttack, Orissa on 23rd of January in 1897 in the rich Hindu family. His father was Janaki Nath Bose who was a successful barrister and mother was Prabhabati Devi. One he was expelled from the Presidency College Calcutta because of being involved on the attack of British Principal. He brilliantly qualified I.C.S Examination but gave up and joined Non-Co-operation Movement in 1921 to fight for freedom of India.
He worked with the Chittaranjan Das, (a political leader of Bengal) and an educator and journalist in the Bengal weekly called Banglar Katha. Later he became Bengal Congress volunteer’s commandant, Principal of National College, Mayor of Calcutta and then appointed as Chief Executive Officer of Corporation. He went to jail several times for his nationalistic activities however he never gets tired and hopeless. He was elected as President of Congress but once he was opposed by Gandhiji because of some political differences with Gandhiji. He moved to East Asia where he prepared his own “Azad Hind Fauj” (means the Indian National Army) to make India an independent country.

Subhash chandra bose in hindi essay

नेताजी ‘सुभाष चन्द्र बोस’ का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक, ओडिशा, भारत में हुआ था। उनकी माता का नाम प्रभावती देवी था। उनके पिता जानकीनाथ एक वकील थे।
सुभाष चन्द्र बोस एक सच्चे सेनानी थे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनका विशेष योगदान रहा। उन्होंने देश को स्वतंत्र कराने के लिए आज़ाद हिन्द फ़ौज़ का गठन किया। उन्होंने इंडियन नेशनल आर्मी का नेतृत्व किया। सुभाष चन्द्र बोस ने महात्मा गांधी के विचारों के विपरीत हिंसक दृष्टिकोण को अपनाया। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के लिए क्रन्तिकारी और हिंसक तरीके की वकालत की। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग होकर आल इंडिया फॉरवर्ड ब्लाक की स्थापना की।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक थे। उन्होंने जनता के बीच राष्ट्रीय एकता, बलिदान और सांप्रदायिक सौहार्द की भावना को जागृत किया। उनकी याद में प्रति वर्ष उनके जन्मदिन 23 जनवरी को ‘देश प्रेम दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। देश प्रेम दिवस का दिन फारवर्ड ब्लाक की पार्टी के सदस्यों के बीच एक भव्य तरीके से मनाया जाता है। सभी जिला प्रशासन और स्थानीय निकायों में भी इस दिन को मनाया जाता है। विभिन्न गैर सरकारी संगठनों द्वारा इस दिन रक्त शिविरों का आयोजन किया जाता है। इस दिन स्कूल और कालेजों में विभिन्न गतिविधियों जैसे प्रदर्शनी, क्विज और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है।

सुभाष चंद्र बोस एस्से

23 जनवरी 1897 का दिन विश्व इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। इस दिन स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक सुभाषचन्द्र बोस का जन्म कटक के प्रसिद्ध वकील जानकीनाथ तथा प्रभावतीदेवी के यहां हुआ।
उनके पिता ने अंगरेजों के दमनचक्र के विरोध में ‘रायबहादुर’ की उपाधि लौटा दी। इससे सुभाष के मन में अंगरेजों के प्रति कटुता ने घर कर लिया। अब सुभाष अंगरेजों को भारत से खदेड़ने व भारत को स्वतंत्र कराने का आत्मसंकल्प ले, चल पड़े राष्ट्रकर्म की राह पर।
आईसीएस की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद सुभाष ने आईसीएस से इस्तीफा दिया। इस बात पर उनके पिता ने उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहा- ‘जब तुमने देशसेवा का व्रत ले ही लिया है, तो कभी इस पथ से विचलित मत होना।’
दिसंबर 1927 में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के बाद 1938 में उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने कहा था – मेरी यह कामना है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में ही हमें स्वाधीनता की लड़ाई लड़ना है। हमारी लड़ाई केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद से नहीं, विश्व साम्राज्यवाद से है। धीरे-धीरे कांग्रेस से सुभाष का मोह भंग होने लगा।
16 मार्च 1939 को सुभाष ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सुभाष ने आजादी के आंदोलन को एक नई राह देते हुए युवाओं को संगठित करने का प्रयास पूरी निष्ठा से शुरू कर दिया। इसकी शुरुआत 4 जुलाई 1943 को सिंगापुर में ‘भारतीय स्वाधीनता सम्मेलन’ के साथ हुई।
5 जुलाई 1943 को ‘आजाद हिन्द फौज’ का विधिवत गठन हुआ। 21 अक्टूबर 1943 को एशिया के विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों का सम्मेलन कर उसमें अस्थायी स्वतंत्र भारत सरकार की स्थापना कर नेताजी ने आजादी प्राप्त करने के संकल्प को साकार किया।
12 सितंबर 1944 को रंगून के जुबली हॉल में शहीद यतीन्द्र दास के स्मृति दिवस पर नेताजी ने अत्यंत मार्मिक भाषण देते हुए कहा- ‘अब हमारी आजादी निश्चित है, परंतु आजादी बलिदान मांगती है। आप मुझे खून दो, मैं आपको आजादी दूंगा।’ यही देश के नौजवानों में प्राण फूंकने वाला वाक्य था, जो भारत ही नहीं विश्व के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
16 अगस्त 1945 को टोक्यो के लिए निकलने पर ताइहोकु हवाई अड्डे पर नेताजी का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और स्वतंत्र भारत की अमरता का जयघोष करने वाला, भारत मां का दुलारा सदा के लिए, राष्ट्रप्रेम की दिव्य ज्योति जलाकर अमर हो गया।

Essay in kannada

Subhash Chandra Bose Essay

ಸುಭಾಷ್ ಚಂದ್ರ ಬೋಸ್ ಅವರು ಭಾರತದಾದ್ಯಂತ ನೇತಾಜಿಯಾಗಿ ಪ್ರಸಿದ್ಧರಾಗಿದ್ದಾರೆ. ಅವರು ಭಾರತದ ಸ್ವಾತಂತ್ರ್ಯಕ್ಕೆ ಭಾರೀ ಕೊಡುಗೆ ನೀಡಿದ ಭಾರತದ ಕ್ರಾಂತಿಕಾರರಾಗಿದ್ದರು. 1897 ರ ಜನವರಿ 23 ರಂದು ಅವರು ಓರಿಸ್ಸಾದಲ್ಲಿನ ಕಟಕ್ನ ಶ್ರೀಮಂತ ಹಿಂದು ಕುಟುಂಬದಲ್ಲಿ ಜನಿಸಿದರು. ಅವರ ತಂದೆ ಹೆಸರು ಜನಕಿನಾಥ್ ಬೋಸ್, ಅವರು ಕಟಕ್ ಜಿಲ್ಲಾ ನ್ಯಾಯಾಲಯದಲ್ಲಿ ಸಾರ್ವಜನಿಕ ಅಭಿಯೋಜಕರಾಗಿದ್ದರು ಮತ್ತು ತಾಯಿಯ ಹೆಸರು ಇಂಫಾಟಿ ದೇವತೆಯಾಗಿತ್ತು. ಸುಭಾಷ್ ತಮ್ಮ ಆರಂಭಿಕ ಶಿಕ್ಷಣವನ್ನು ಕಟಕ್ನಲ್ಲಿರುವ ಆಂಗಲ್ಸ್ ಇಂಡಿಯನ್ ಸ್ಕೂಲ್ನಿಂದ ಪಡೆದರು ಮತ್ತು ಕಲ್ಕತ್ತಾದ ಸ್ಕಾಟಿಷ್ ಚರ್ಚ್ ಕಾಲೇಜಿನ ತತ್ವಶಾಸ್ತ್ರದಲ್ಲಿ ಸ್ನಾತಕೋತ್ತರ ಪದವಿಯನ್ನು ಪಡೆದರು.
ಐಎಸ್ಎಸ್ ಪರೀಕ್ಷೆಯನ್ನು ಯಶಸ್ವಿಯಾಗಿ ಜಾರಿಗೊಳಿಸಿದರೂ, ದೇಶ್ಭಾಂದೂ ಚಿತ್ತರಂಜನ್ ದಾಸ್ ತನ್ನ ತಾಯ್ನಾಡಿನ ಸ್ವಾತಂತ್ರ್ಯಕ್ಕಾಗಿ ಪ್ರಭಾವಕ್ಕೊಳಗಾದ ನಂತರ ಅಸಹಕಾರ ಚಳವಳಿಯಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಂಡಿದ್ದ, ಅವರು ಒಬ್ಬ ಕೆಚ್ಚೆದೆಯ ಮತ್ತು ಮಹತ್ವಾಕಾಂಕ್ಷೆಯ ಭಾರತೀಯ ಯುವಕರಾಗಿದ್ದರು. ನಮ್ಮ ಸ್ವಾತಂತ್ರ್ಯಕ್ಕಾಗಿ ಬ್ರಿಟಿಷ್ ಆಳ್ವಿಕೆಗೆ ವಿರುದ್ಧವಾಗಿ ಅವರು ನಿರಂತರವಾದ ಹಿಂಸಾತ್ಮಕ ಚಳವಳಿಯಲ್ಲಿ ಹೋರಾಡುತ್ತಿದ್ದರು.
ಮಹಾತ್ಮ ಗಾಂಧಿಯವರೊಂದಿಗಿನ ಕೆಲವು ರಾಜಕೀಯ ಭಿನ್ನತೆಗಳಿಂದಾಗಿ, 1930 ರಲ್ಲಿ ಕಾಂಗ್ರೆಸ್ ಅಧ್ಯಕ್ಷರಾಗಿದ್ದರೂ ಅವರು ಕಾಂಗ್ರೆಸ್ ತೊರೆದರು. ಒಂದು ದಿನ, ನೇತಾಜಿ ತನ್ನದೇ ಆದ ಭಾರತೀಯ ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಶಕ್ತಿಶಾಲಿ ಪಕ್ಷದ ‘ಆಜಾದ್ ಹಿಂದ್ ಫೌಜ್’ಯನ್ನು ಮಾಡಿದರು ಏಕೆಂದರೆ ಗಾಂಧೀಜಿಯ ಅಹಿಂಸಾತ್ಮಕ ನೀತಿಯು ಭಾರತವನ್ನು ಮುಕ್ತ ರಾಷ್ಟ್ರವೆಂದು ಮಾಡಲು ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲವೆಂದು ಅವರು ನಂಬಿದ್ದರು. ಅಂತಿಮವಾಗಿ, ಬ್ರಿಟಿಷ್ ಆಳ್ವಿಕೆಯ ವಿರುದ್ಧ ಹೋರಾಡಲು ಅವರು ದೊಡ್ಡ ಮತ್ತು ಶಕ್ತಿಯುತ “ಆಜಾದ್ ಹಿಂದ್ ಫೌಜ್” ಮಾಡಿದರು.
ಅವರು ಜರ್ಮನಿಗೆ ಹೋದರು ಮತ್ತು ಕೆಲವು ಭಾರತೀಯ ಪಿಓಡಬ್ಲ್ಯೂಗಳು ಮತ್ತು ಅಲ್ಲಿ ವಾಸಿಸುವ ಭಾರತೀಯರ ಸಹಾಯದಿಂದ ಭಾರತೀಯ ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಸೇನೆಯನ್ನು ರಚಿಸಿದರು. ಹಿಟ್ಲರನ ಬಹಳಷ್ಟು ನಿರಾಶೆಯ ನಂತರ, ಅವರು ಜಪಾನ್ಗೆ ತೆರಳಿದರು ಮತ್ತು ಅವರ ಭಾರತೀಯ ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಸೇನೆಗೆ “ದೆಹಲಿಗೆ ಹೋಗೋಣ” ಎಂಬ ಪ್ರಸಿದ್ಧ ಘೋಷಣೆ ನೀಡಿದರು, ಅಲ್ಲಿ ಆಜಾದ್ ಹಿಂದ್ ಫೌಜ್ ಮತ್ತು ಆಂಗ್ಲೋ ಅಮೇರಿಕನ್ ಪಡೆಗಳ ನಡುವೆ ಹಿಂಸಾತ್ಮಕ ಹೋರಾಟ ನಡೆಯಿತು. ದುರದೃಷ್ಟವಶಾತ್, ಅವರು ನೇತಾಜಿಯೊಂದಿಗೆ ಶರಣಾಗಬೇಕಾಯಿತು. ಶೀಘ್ರದಲ್ಲೇ, ಟೋಕಿಯೊ ವಿಮಾನದಲ್ಲಿ ಬಿಡಲಾಗಿತ್ತು, ಆದರೆ ವಿಮಾನವು ಫಾರ್ಮಾಸಾದ ಒಳ ಭಾಗಕ್ಕೆ ಅಪ್ಪಳಿಸಿತು. ಆ ವಿಮಾನ ಅಪಘಾತದಲ್ಲಿ ನೇತಾಜಿಯು ಮೃತಪಟ್ಟಿದ್ದಾನೆ ಎಂದು ವರದಿಯಾಗಿದೆ. ನೇತಾಜಿಯ ಸಾಹಸ ಇನ್ನೂ ಕೆಲವು ಭಾರತೀಯ ಯುವಜನರಿಗೆ ಲಕ್ಷಾಂತರ ಯುವಕರನ್ನು ಪ್ರೇರೇಪಿಸುತ್ತದೆ.

Desh prem divas hindi essay

Q नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारत के एक महान देशभक्त और बहादुर स्वतंत्रता सेनानी थे। वो स्वदेशानुराग और जोशपूर्ण देशभक्ति के एक प्रतीक थे। हर भारतीय बच्चे को उनको और भारत की स्वतंत्रता के लिये किये गये उनके कार्यों के बारे में जरुर जानना चाहिये। इनका जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में एक हिन्दू परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके अपने गृह-नगर में पूरी हुयी थी जबकि उन्होंने अपना मैट्रिक कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज से किया और कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से दर्शनशास्त्र में ग्रेज़ुएशन पूरा किया। बाद में वो इंग्लैंड गये और चौथे स्थान के साथ भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा को पास किया।
अंग्रेजों के क्रूर और बुरे बर्ताव के कारण अपने देशवासियों की दयनीय स्थिति से वो बहुत दुखी थे। भारत की आजादी के माध्यम से भारत के लोगों की मदद के लिये सिविल सेवा के बजाय उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने का फैसला किया। देशभक्त देशबंधु चितरंजन दास से नेताजी बहुत प्रभावित थे और बाद में बोस कलकत्ता के मेयर के रुप में और उसके बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। बाद में गांधी जी से वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने पार्टी छोड़ दी। कांग्रेस पार्टी छोड़ने के बाद इन्होंने अपनी फारवर्ड ब्लॉक पार्टी की स्थापना की।
वो मानते थे कि अंग्रेजों से आजादी पाने के लिये अहिंसा आंदोलन काफी नहीं है इसलिये देश की आजादी के लिये हिंसक आंदोलन को चुना। नेताजी भारत से दूर जर्मनी और उसके बाद जापान गये जहाँ उन्होंने अपनी भारतीय राष्ट्रीय सेना बनायी, ‘आजाद हिन्द फौज’। ब्रिटिश शासन से बहादुरी से लड़ने के लिये अपनी आजाद हिन्द फौज में उन देशों के भारतीय रहवासियों और भारतीय युद्ध बंदियों को उन्होंने शामिल किया। सुभाष चन्द्र बोस ने अंग्रेजी शासन से अपनी मातृभूमि को मुक्त बनाने के लिये “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” के अपने महान शब्दों के द्वारा अपने सैनिकों को प्रेरित किया।
ऐसा माना जाता है कि 1945 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु एक प्लेन दुर्घटना में हुयी थी। ब्रिटिश शासन से लड़ने के लिये उनकी भारतीय राष्ट्रीय सेना की सभी उम्मीदें उनकी मृत्यु की बुरी खबर के साथ समाप्त हो गयी थी। उनकी मृत्यु के बाद भी, कभी न खत्म होने वाली प्रेरणा के रुप में भारतीय लोगों के दिलों में अपनी जोशपूर्ण राष्ट्रीयता के साथ वो अभी-भी जिदा हैं। वैज्ञानिक विचारों के अनुसार, अतिभार जापानी प्लेन दुर्घटना के कारण थर्ड डिग्री बर्न की वजह से उनकी मृत्यु हुयी। एक अविस्मरणीय वृतांत के रुप में भारतीय इतिहास में नेताजी का महान कार्य और योगदान चिन्हित रहेगा।

सुभाष चंद्र बोस एस्से

सुभाष चन्द्र बोस पूरे भारत भर में नेताजी के नाम से मशहूर हैं। वो भारत के एक क्रांतिकारी व्यक्ति थे जिन्होंने भारत की आजादी के लिये बहुत बड़ा योगदान दिया। 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक अमीर हिन्दू परिवार में इनका जन्म हुआ। इनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस था जो कटक जिला न्यायालय में एक सरकारी वकील थे और माँ का नाम प्रभावती देवी था। सुभाष ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कटक में एंग्लों इंडियन स्कूल से ली और कलकत्ता विश्वविद्यालय, स्कॉटिश चर्च कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।
वो एक बहादुर और महत्वकांक्षी भारतीय युवा थे जिसने सफलतापूर्वक आई.सी.एस परीक्षा पास होने के बावजूद अपनी मातृभूमि की आजादी के लिये देशबंधु चितरंजन दास द्वारा प्रभावित होने के बाद असहयोग आंदोलन से जुड़ गये। हमारी आजादी के लिये ब्रिटिश शासन के खिलाफ वो लगातार हिंसात्मक आंदोलन में लड़ते रहे।
महात्मा गांधी के साथ कुछ राजनीतिक मतभेदों के कारण 1930 में कांग्रेस के अध्यक्ष होने के बावजूद उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया। एक दिन नेताजी ने अपनी खुद की भारतीय राष्ट्रीय शक्तिशाली पार्टी ‘आजाद हिन्द फौज’ बनायी क्योंकि उनका मानना था कि भारत को एक आजाद देश बनाने के लिये गांधीजी की अहिंसक नीति सक्षम नहीं है। अंतत: उन्होंने ब्रिटिश शासन से लड़ने के लिये एक बड़ी और शक्तिशाली “आजाद हिन्द फौज” बनायी।
वो जर्मनी गये और कुछ भारतीय युद्धबंदियों और वहाँ रहने वाले भारतीयों की मदद से भारतीय राष्ट्रीय सेना का गठन किया। हिटलर के द्वारा बहुत निराशा के बाद वो जापान गये और अपनी भारतीय राष्ट्रीय सेना को एक प्रसिद्ध नारा दिया “दिल्ली चलो” जहाँ पर आजाद हिन्द फौज और एंग्लों अमेरिकन बलों के बीच एक हिंसक लड़ाई हुयी। दुर्भाग्यवश, नेताजी सहित उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा। जल्द ही, टोक्यो के लिये प्लेन में छोड़े गये हालांकि फारमोसा के आंतरिक भाग में प्लेन दुर्घटनाग्रस्त हो गया। ये रिपोर्ट किया गया कि उस प्लेन दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गयी। नेताजी का साहसिक कार्य आज भी लाखों भारतीय युवाओं को देश के लिये कुछ कर गुजरने के लिये प्रेरित करता है।

Essay in gujarati

સુભાષ ચંદ્ર બોઝ નેતાજી તરીકે સમગ્ર ભારતમાં પ્રખ્યાત છે. તે ભારતના ક્રાંતિકારી હતા જેમણે ભારતની સ્વતંત્રતામાં મોટો ફાળો આપ્યો હતો. 23 જાન્યુઆરી, 1897 ના રોજ, તેઓ ઓરિસ્સાના કટૅકના શ્રીમંત હિંદુ પરિવારમાં જન્મ્યા હતા. તેમના પિતાનું નામ જનકિનાથ બોઝ હતું, જે કટ્ટકના જિલ્લા અદાલતમાં જાહેર વકીલ હતા અને માતાનું નામ ઇમ્ફતી દેવી હતી. સુભાષે પ્રારંભિક શિક્ષણ કટૅકમાં એન્ગ્લોસ ઇન્ડિયન સ્કૂલમાંથી લીધું અને સ્કોટિશ ચર્ચ કોલેજ, કલકત્તા યુનિવર્સિટીમાંથી ફિલસૂફીમાં સ્નાતકની ડિગ્રી મેળવી.
તે એક બહાદુર અને મહત્વાકાંક્ષી ભારતીય યુવા હતા, જેમણે આઇસીએસ પરીક્ષા સફળતાપૂર્વક પાસ કરી હોવા છતાં, દેશભાંડ ચિત્તરંજન દાસ દ્વારા તેમની માતૃભૂમિની સ્વતંત્રતા માટે પ્રભાવિત થયા પછી અસહકાર ચળવળ સાથે જોડાયા હતા. અમારા સ્વાતંત્ર્ય માટે બ્રિટીશ શાસન સામે, તેઓએ એક સતત હિંસક ચળવળમાં લડવું ચાલુ રાખ્યું.
મહાત્મા ગાંધી સાથેના કેટલાક રાજકીય તફાવતોને કારણે, તેમણે 1930 માં કૉંગ્રેસ અધ્યક્ષ હોવા છતાં કોંગ્રેસ છોડી દીધી હતી. એક દિવસ, નેતાજીએ પોતાની રાષ્ટ્રીય રાષ્ટ્રીય પાર્ટી ‘આઝાદ હિન્દ ફૌજ’ બનાવી કારણ કે તેઓ માનતા હતા કે ગાંધીજીની અહિંસક નીતિ ભારતને એક સ્વતંત્ર દેશ બનાવવા માટે સક્ષમ નથી. આખરે, તેમણે બ્રિટીશ શાસન સામે લડવા માટે એક મોટો અને શક્તિશાળી “આઝાદ હિન્દ ફૌજ” બનાવ્યો.
તે જર્મની ગયો અને કેટલાક ભારતીય POWs અને ત્યાં રહેતા ભારતીયોની મદદથી ભારતીય રાષ્ટ્રીય સેનાની રચના કરી. હિટલરે ખૂબ હતાશા પછી તેમણે જાપાન વચ્ચે હિંસક અથડામણમાં હતી અને ઇન્ડિયન નેશનલ આર્મી “દિલ્હી” ના જાણીતા સૂત્ર કરવામાં આવી છે કે જ્યાં ઇન્ડિયન નેશનલ આર્મી અને એંગ્લો-અમેરિકન દળો. કમનસીબે, તેને નેતાજી સાથે શરણાગતિ કરવી પડી. ટૂંક સમયમાં, ટોક્યો માટે વિમાનમાં જતા રહ્યા, જોકે વિમાન ફ્ર્મોસાના આંતરિક ભાગમાં ક્રેશ થયું. એવું જાણવામાં આવ્યું હતું કે વિમાનની અથડામણમાં નેતાજીનું અવસાન થયું હતું. નેતાજીનું સાહસ હજુ પણ કેટલાક દેશો માટે જવા માટે લાખો ભારતીય યુવાનોને પ્રેરણા આપે છે.

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सुभाषचंद्र बोस संपूर्ण भारतभर नेताजी म्हणून प्रसिद्ध आहे. ते भारताचे क्रांतिकारक होते ज्यांनी भारताच्या स्वातंत्र्यासाठी प्रचंड योगदान दिले. 23 जानेवारी 18 9 7 रोजी त्यांचा जन्म उडीसातील कटक येथील श्रीमंत हिंदू कुटुंबात झाला. त्यांच्या वडिलांचे नाव जनकीनाथ बोस होते, जो कटकच्या जिल्हा न्यायालयात सार्वजनिक अभियोजक होते आणि आईचे नाव इम्फाती देवी होते. सुभाष यांनी कटकमधील अँगलस इंडियन स्कूलमधून प्रारंभिक शिक्षण घेतले आणि स्कॉटिश चर्च कॉलेजमधील कलकत्ता विद्यापीठातील तत्त्वज्ञान विषयातील पदवी प्राप्त केली.
ते यशस्वीरित्या Aiksi.as चाचणी असूनही त्यांच्या मायदेशी स्वातंत्र्य Deshbandhu चित्तरंजन दास फटका केल्याच्या असहकार चळवळ सामील झाले एक शूर आणि महत्वाकांक्षी तरुण आहेत. आमच्या स्वातंत्र्यासाठी ब्रिटिशांच्या विरोधात त्यांनी सतत हिंसक चळवळीत लढत राहिले.
महात्मा गांधी यांच्यातील काही राजकीय मतभेदांमुळे 1 9 30 साली काँग्रेसचे अध्यक्ष असतानाही त्यांनी काँग्रेस सोडली. एके दिवशी, नेताजींनी स्वत: च्या भारतीय राष्ट्रीय पक्षाचे ‘आझाद हिंद फौज’ बनविले कारण त्यांचा असा विश्वास होता की गांधीजींच्या अहिंसक धोरणामुळे भारत एक मुक्त देश बनू शकला नाही. शेवटी, त्यांनी ब्रिटिश शासनाने लढा देण्यासाठी एक मोठा आणि शक्तिशाली “आझाद हिंद फोज” बनविला.
ते जर्मनीत गेले आणि काही भारतीय पीओयू आणि तेथे राहणारे भारतीय यांच्या मदतीने भारतीय राष्ट्रीय सैन्याची स्थापना केली. हिटलर जास्त निराशा केल्यानंतर तो जपान दरम्यान हिंसक लढाई होती आणि भारतीय राष्ट्रीय सेना “दिल्ली च्या” एक सुप्रसिद्ध घोषणा झाली ते भारतीय राष्ट्रीय सेना आणि अँग्लो-अमेरिकन सैन्याने. दुर्दैवाने, त्याला नेताजींबरोबर आत्मसमर्पण करावे लागले. लवकरच, विमानात टोकोसाठी विमान सोडण्यात आले, विमानाने फर्मोसाच्या आतील भागामध्ये क्रॅश केले. असे सांगण्यात आले की विमानाच्या अपघातात नेताजींचा मृत्यू झाला. नेताजींच्या साहसाने अजूनही लाखो भारतीय तरुणांना देशासाठी जायला उद्युक्त केले आहे.



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