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वाल्मीकि जयंती श्लोक | Valmiki Jayanti Shloka in Hindi, Sanskrit & Marathi

Valmiki Jayanti Shloka in Sanskrit

Valmiki jayanti 2019 :”श्लोक” (महाकाव्य मीटर) के निर्माण का श्रेय वाल्मीकि को जाता है। ऐसा माना जाता है कि वह पारंपरिक रूप से दबे-कुचले वर्ग के थे और डाकू थे। आदि कवि (प्रथम कवि), वाल्मीकि का जन्मदिन आश्विन (सितंबर-अक्टूबर) की पूर्णिमा (पूर्णिमा) को मनाया जाता है। वाल्मीकि रामायण के रचयिता हैं। वह राम के समकालीन थे, रामायण के नायक थे। एक दिन कुछ ऋषियों के प्रभाव में, उसने अपने कर्मों को पश्चाताप किया और एक धर्मनिष्ठ बन गया और तपस्या का सबसे कठिन कार्य किया। वाल्मीकि स्वयं भी रामायण में एक पात्र हैं। उन्होंने सीता को अपने धर्मोपदेश में प्राप्त किया और अपने जुड़वां बेटों कुश और लव के शिक्षक थे।

Valmiki Jayanti Shloka in Sanskrit

valmiki jayanti 2019 date: इस वर्ष महर्षि वाल्मीकि जयंती 13 अक्टूबर को है|


अपना-पराया-गुणगान् व परजनः स्वजनो निर्गुणोऽपि वा । निर्गणः स्वजनः श्रेयान् यः परः पर एव सः ॥
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उत्साह-उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम् । सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चदपि दुर्लभम् ॥
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वाल्मीकि जयंती श्लोक


उत्साह बड़ा बलवान होता है; उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं है । उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है ।
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मनुष्य जैसा भी अच्छा या बुरा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है । कर्त्ता को अपने कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है ।
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Valmiki Jayanti Slokas in English

Maharishi Valmiki Jayanti Shloka


क्रोध की दशा में मनुष्य को कहने और न कहने योग्य बातों का विवेक नहीं रहता । क्रुद्ध मनुष्य कुछ भी कह सकता है और कुछ भी बक सकता है । उसके लिए कुछ भी अकार्य और अवाच्य नहीं है ।
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पराया मनुष्य भले ही गुणवान् हो तथा स्वजन सर्वथा गुणहीन ही क्यों न हो, लेकिन गुणी परजन से गुणहीन स्वजन ही भला होता है । अपना तो अपना है और पराया पराया ही रहता है ।
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Balmiki Jayanti Slokas in Tamil


துக்கம் மனிதனின் துணிச்சலை அழிக்கிறது.
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மகிழ்ச்சி எப்போதும் நீடிக்கும்.
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Valmiki Jayanti Shloka


सत्य ही संसार में ईश्वर है; धर्म भी सत्य के ही आश्रित है; सत्य ही समस्त भव - विभव का मूल है; सत्य से बढ़कर और कुछ नहीं है ।
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उत्साह हीन, दीन और शोकाकुल मनुष्य के सभी काम बिगड़ जाते हैं , वह घोर विपत्ति में फंस जाता है ।
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Valmiki Jayanti Shlok


धर्म-धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम् । धर्मण लभते सर्वं धर्मप्रसारमिदं जगत् ॥
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सत्य -सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः । सत्यमूलनि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम् ॥
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Valmiki Jayanti Slokas


किसी को जब बहुत दिनों तक अत्यधिक दुःख भोगने के बाद महान सुख मिलता है तो उसे विश्वामित्र मुनि की भांति समय का ज्ञान नहीं रहता - सुख का अधिक समय भी थोड़ा ही जान पड़ता है ।
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धर्म से ही धन, सुख तथा सब कुछ प्राप्त होता है । इस संसार में धर्म ही सार वस्तु है ।
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Valmiki Jayanti Shloka in Marathi

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